गांधी जयंती के दिन राजस्थान कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा है। भरतपुर राजघराने से ताल्लुक रखने वाले दिग्गज जाट नेता और अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे विश्वेंद्र सिंह ने कांग्रेस से अलग होने की घोषणा कर दी है। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा — ‘घुटन से मरने के बजाय, आत्म-सम्मान के साथ मरना बेहतर है।’ पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच यह घटनाक्रम कांग्रेस संगठन के लिए एक नई और गंभीर सियासी चुनौती बनकर सामने आया है।
विश्वेंद्र सिंह ने अपने संदेश में कहा कि उन्होंने जीवन में हमेशा अपने इष्ट गिरिराज महाराज और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर फैसले लिए हैं। पार्टी के कुछ नेताओं के बयानों से उनके समर्थक नाराज हुए और उन्हें भी गहरा दुख पहुंचा। उनका साफ कहना था — ‘अगर सच बोलना और गलत व झूठी बातों का समर्थन न करना गुनाह है, तो मैं हर बार यह गुनाह करूंगा। मैं न तो गलत करता हूं और न ही गलत बर्दाश्त करता हूं।’
सुबह खंडन, शाम को ऐलान — शुक्रवार भर बदला घटनाक्रम
दिलचस्प बात यह है कि 2 अक्टूबर की सुबह तक विश्वेंद्र सिंह इस्तीफे की खबरों को खारिज कर रहे थे। सुबह एक मीडिया कर्मी से बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है और सोशल मीडिया पर जारी उनके संदेश में व्यक्त पीड़ा को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। लेकिन दिन चढ़ते-चढ़ते घटनाक्रम बदला और शाम होते-होते उन्होंने कांग्रेस से अलग होने का ऐलान कर दिया।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, ऐलान के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उनसे संपर्क साधने में जुट गए हैं। हालांकि, खबर लिखे जाने तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई थी कि उन्होंने औपचारिक रूप से अपना लिखित इस्तीफा पार्टी नेतृत्व को सौंपा है या नहीं।
कौन हैं विश्वेंद्र सिंह — तीन बार सांसद, दो बार मंत्री
विश्वेंद्र सिंह राजस्थान की राजनीति में कोई नया नाम नहीं हैं। भरतपुर के पूर्व राजघराने से आने वाले सिंह तीन बार सांसद और तीन बार विधायक रह चुके हैं, और दो बार मंत्री पद भी संभाल चुके हैं। अशोक गहलोत सरकार में वह कैबिनेट मंत्री थे।
उनका सियासी सफर कई मोड़ों से गुजरा है — वह पहले भाजपा के साथ भी रह चुके हैं और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए। 2020 में सचिन पायलट के नेतृत्व वाले राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान भी उनका नाम प्रमुखता से सामने आया था। भरतपुर राजघराने के प्रमुख चेहरे के तौर पर क्षेत्र में उनकी राजनीतिक और सामाजिक पकड़ मानी जाती है, और राजघराने से जुड़े ऐतिहासिक संबंधों के कारण जाट समुदाय में भी उनकी एक अलग पहचान है। पूर्वी राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर और करौली जिलों में जाट समुदाय की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
वो आंकड़े जो बने इस्तीफे का ट्रिगर
विश्वेंद्र सिंह की नाराजगी का सीधा तार हालिया नगर निकाय चुनावों के नतीजों से जुड़ा है। उन्होंने कांग्रेस के प्रदर्शन को ‘चिंताजनक’ बताते हुए कई ठोस आंकड़े रखे:
| निकाय | कांग्रेस की स्थिति | नतीजा |
|---|---|---|
| पाली नगर निगम (65 सदस्य) | 29 पार्षदों का समर्थन, भाजपा के 21 | कांग्रेस उम्मीदवार को सिर्फ 3 वोट; भाजपा 5 वोट से जीती |
| अलवर नगर निगम (65 सदस्य) | भाजपा 28, कांग्रेस 23 पार्षद | 13 निर्दलीयों का समर्थन भाजपा को, भाजपा ने बोर्ड बनाया |
| डीग (विश्वेंद्र का पूर्व विधानसभा क्षेत्र) | कांग्रेस का गढ़ माना जाता था | कांग्रेस को एक भी पार्षद सीट नहीं; भाजपा 16, निर्दलीय 24 |
पाली में कांग्रेस के कुछ पार्षदों ने भाजपा के पक्ष में और कुछ ने कांग्रेस की बागी निर्दलीय उम्मीदवार राजबाला के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की। विश्वेंद्र सिंह का सवाल था — ‘मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पूरे राजस्थान में रोड शो किए, लेकिन राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसा क्यों नहीं किया?’
डोटासरा से टकराव की पृष्ठभूमि
इस्तीफे से पहले विश्वेंद्र सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल चुके थे। भरतपुर और डीग में निकाय चुनाव के दौरान टिकट वितरण में पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप उन्होंने लगाया था। उनके मुताबिक डीग और भरतपुर के जिला अध्यक्षों ने अपनी पसंद के उम्मीदवारों को टिकट दिए, जिसका खामियाजा पार्टी को चुनाव में भुगतना पड़ा।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने दोनों जिला स्तर के नेताओं को संरक्षण दिया। इसके साथ ही उन्होंने डोटासरा के शिक्षा मंत्री रहने के दौरान हुई कुछ भर्ती प्रक्रियाओं और REET से जुड़े पुराने विवादों की जांच की मांग भी उठाई थी। (ये आरोप विश्वेंद्र सिंह की ओर से लगाए गए हैं; संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।)
डोटासरा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस में किसी तरह के अंदरूनी विवाद से इनकार किया था। विडंबना यह भी है कि पार्टी ने अब उन्हीं जिला अध्यक्षों से विश्वेंद्र सिंह के खिलाफ रिपोर्ट तैयार करने को कहा है — जिसे सिंह खेमे ने अपमानजनक बताया है।
पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए नई चुनौती
विश्वेंद्र सिंह का यह रुख ऐसे समय में आया है जब राजस्थान में पंचायत चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। पूर्वी राजस्थान कांग्रेस और भाजपा — दोनों के लिए अहम इलाका है। भरतपुर संभाग में जाट मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रहती है, और विश्वेंद्र सिंह जैसे कद के नेता का पार्टी छोड़ना संगठनात्मक और चुनावी — दोनों स्तरों पर नुकसान पहुंचा सकता है।
आगे क्या — अनसुलझे सवाल
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि विश्वेंद्र सिंह का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा। इसको लेकर अटकलें तेज हैं, लेकिन अभी तक उनकी ओर से कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। दूसरा सवाल औपचारिकता का है — क्या उन्होंने वास्तव में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से लिखित इस्तीफा दिया है, या यह अभी सोशल मीडिया पर की गई घोषणा तक ही सीमित है?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
उनके मुताबिक पार्टी में चापलूसी की परंपरा बढ़ रही है और कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है। निकाय चुनाव में टिकट वितरण और खराब प्रदर्शन को लेकर उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर सीधे आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा कि आत्मसम्मान से समझौता करके वह पार्टी में नहीं रह सकते।
उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कांग्रेस से अलग होने की घोषणा की है। खबर लिखे जाने तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी कि उन्होंने लिखित में अपना इस्तीफा पार्टी नेतृत्व को सौंपा है या नहीं।
उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें चल रही हैं, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। वह पहले भाजपा में भी रह चुके हैं, इसलिए हर संभावना पर चर्चा हो रही है।
भरतपुर, धौलपुर और करौली में जाट समुदाय की मजबूत मौजूदगी है और विश्वेंद्र सिंह की क्षेत्र में पकड़ मानी जाती है। पंचायत चुनाव से ठीक पहले उनका पार्टी छोड़ना कांग्रेस के लिए संगठनात्मक और चुनावी — दोनों तरह की चुनौती है।