बाड़मेर/जैसलमेर। अगर 10 अक्टूबर तक बाड़मेर और जैसलमेर के अकालग्रस्त इलाकों में पशु शिविर और चारा डिपो शुरू नहीं हुए, तो जिला कलेक्ट्रेट का विशाल घेराव होगा। यह सीधी चेतावनी रविवार (4 अक्टूबर) को शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने राज्य सरकार को दी है। उनका आरोप है कि भीषण अकाल और पेयजल संकट के बीच बेजुबान पशुधन मरने की कगार पर है, लेकिन सरकार की घोषणाएं धरातल पर कहीं नजर नहीं आ रही हैं।
विधायक भाटी के इस बयान से पश्चिमी राजस्थान की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के बाड़मेर जिले के बाछड़ाऊ दौरे के ठीक बाद भाटी का यह हमला इसलिए भी अहम है, क्योंकि उनका दावा है कि इस दौरे से जनता को बड़ी राहत की उम्मीद थी, लेकिन मिला सिर्फ निराशा। भाटी के मुताबिक दौरे पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, जबकि राहत के नाम पर महज एक करोड़ रुपये की घोषणा की गई, जो ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।
10 अक्टूबर की डेडलाइन क्यों मायने रखती है
भाटी ने स्पष्ट कहा है कि बाड़मेर और जैसलमेर जिले इस समय भयानक अकाल की मार झेल रहे हैं। किसानों और पशुपालकों की हालत बेहद खराब है। अकाल के कारण बड़ी संख्या में पशुधन प्रभावित हो रहा है और पशुपालकों के सामने अपने मवेशियों को बचाने का भारी संकट खड़ा हो गया है।
उनका कहना है कि सरकार ने पशु शिविरों के संचालन की घोषणा तो कर दी, लेकिन अब तक इनके लिए कोई स्पष्ट रोडमैप तैयार नहीं किया गया है। कब शिविर खुलेंगे, कितने खुलेंगे, कहां खुलेंगे — इन सवालों का जवाब किसी अधिकारी के पास नहीं है। इसी अस्पष्टता के खिलाफ भाटी ने सरकार को 10 अक्टूबर की समय-सीमा दी है। उनकी मांग साफ है: दोनों जिलों में बिना किसी देरी के पशु शिविर और चारा डिपो खोले जाएं, ताकि बेजुबान पशुधन को मरने से बचाया जा सके।
मुख्यमंत्री के दौरे पर क्यों उठ रहे सवाल
बाछड़ाऊ का दौरा पंचायती राज चुनाव से ठीक पहले हुआ था, इसलिए इसकी राजनीतिक अहमियत भी बढ़ गई है। भाटी का आरोप है कि कार्यक्रम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन धरातल पर जनता को राहत देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।
भाटी ने सरकारी कार्यक्रमों में पैसे बहाने को लेकर एक तीखी तुलना की। उन्होंने कहा कि पशु चारे के लिए एक-एक करोड़ रुपये दिए गए हैं, लेकिन जरा यह भी सोचिए कि उस अकेले कार्यक्रम में 20 करोड़ रुपये फूंक दिए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि वहां जो डोम लगे और भीड़ जुटाई गई, वह पैसा किसका था — वह जनता की और हमारी-आपकी जेब का पैसा था।
प्रशासनिक अमले और भीड़ के खेल का आरोप
भाटी ने सिर्फ खर्च को लेकर ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक अमले के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। उनका आरोप है कि कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने के लिए पटवारी, शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और नरेगा मजदूरों को बसों में भरकर लाया गया।
विधायक का कहना है कि भीड़ जुटाने के लिए जो तेल जलाया गया, क्या वह जनता की गाढ़ी कमाई नहीं थी? उन्होंने खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि सरकार को 20-25 करोड़ रुपये खर्च ही करने थे, तो सूबे के अकाल पीड़ित इलाकों और किसानों की मदद में लगाते, तब जाकर कोई धर्म का काम होता। यह टिप्पणी प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा सवाल बन गई है — कि सरकारी कार्यक्रमों के प्रचार पर खर्च होने वाली रकम और राहत कार्यों की रकम के बीच का अंतर आखिर कितना बड़ा है।
पेयजल संकट और टंकियों की समय-सीमा का मुद्दा
अकाल के साथ-साथ पेयजल संकट भी इस विवाद का अहम हिस्सा है। भाटी ने पानी की टंकियों की समय-सीमा को 31 दिसंबर तक बढ़ाए जाने के फैसले पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि बाड़मेर जिले में कई स्थानों पर अभी तक पानी की टंकियों से नियमित जलापूर्ति शुरू ही नहीं हुई है। ऐसे में समय-सीमा बढ़ाने की घोषणा सिर्फ जनता को गुमराह करने का तरीका है। भाटी का तर्क है कि पहले उन जगहों पर टंकर व्यवस्था को सुचारु किया जाए, जहां लोग पानी के लिए तरस रहे हैं।
चारागाह भूमि सोलर कंपनियों के हाथों में
एक और गंभीर आरोप चारागाह भूमि को लेकर है। भाटी ने कहा कि पश्चिमी राजस्थान में लाखों की संख्या में पशुधन मौजूद है, लेकिन इन बेजुबान पशुओं के लिए उपलब्ध चारागाह भूमि का एक बड़ा हिस्सा पहले ही बड़ी सोलर कंपनियों को सौंप दिया गया है।
यह मुद्दा अकाल के समय और भी गंभीर हो जाता है। जब चारे की किल्लत हो, तब चारागाह ही पशुपालकों का आखिरी सहारा होता है। अगर चारागाह भूमि सोलर प्लांटों के हाथों में चली गई है, तो पशुपालक अपने मवेशियों को चराएंगे कहां? भाटी ने मांग की है कि इस नीति पर पुनर्विचार किया जाए और अकाल प्रभावित क्षेत्रों में चारागाह भूमि को पशुपालन के लिए सुरक्षित रखा जाए।
गाय के नाम पर राजनीति का तंज
रविंद्र सिंह भाटी ने सत्ताधारी भाजपा सरकार पर सीधा तंज कसते हुए कहा कि गाय के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी आज सत्ता में बैठी है। लेकिन जब गाय और अन्य पशुधन को बचाने की वास्तविक जरूरत सामने आई है, तो सरकार कोई कदम आगे नहीं बढ़ा रही है। भाटी ने मांग की कि बाड़मेर और जैसलमेर में तत्काल पशु शिविर, चारा डिपो और पेयजल की समुचित व्यवस्था शुरू की जाए, ताकि आमजन के साथ-साथ पशुधन को भी फौरी राहत मिल सके।
भाटी की प्रमुख मांगें एक नजर में
- पशु शिविर: बाड़मेर-जैसलमेर में तत्काल पशु शिविर खोले जाएं (डेडलाइन: 10 अक्टूबर)
- चारा डिपो: दोनों जिलों में बिना देरी चारा डिपो शुरू हों
- पेयजल व्यवस्था: टंकर आपूर्ति नियमित और सुचारु हो
- चारागाह भूमि: सोलर कंपनियों को दी गई भूमि की समीक्षा हो
- राहत पैकेज: अकाल पीड़ितों के लिए ठोस आर्थिक राहत घोषित हो
FAQs
प्रश्न: रविंद्र सिंह भाटी ने सरकार को क्या चेतावनी दी है?
उत्तर: भाटी ने कहा है कि अगर 10 अक्टूबर तक बाड़मेर और जैसलमेर में पशु शिविर और चारा डिपो शुरू नहीं किए गए, तो वे जिला कलेक्ट्रेट का विशाल घेराव करेंगे।
प्रश्न: बाड़मेर-जैसलमेर में क्या संकट है?
उत्तर: दोनों जिले भीषण अकाल और पेयजल संकट की मार झेल रहे हैं। अकाल के कारण बड़ी संख्या में पशुधन प्रभावित हो रहा है और कई स्थानों पर पानी की टंकियों से नियमित आपूर्ति शुरू ही नहीं हुई है।
प्रश्न: भाटी ने मुख्यमंत्री के बाछड़ाऊ दौरे को लेकर क्या आरोप लगाए?
उत्तर: भाटी का आरोप है कि दौरे से जनता को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन मिला सिर्फ निराशा। कार्यक्रम पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, जबकि राहत के नाम पर महज एक करोड़ रुपये की घोषणा की गई। उन्होंने भीड़ जुटाने के लिए प्रशासनिक अमले के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया।
प्रश्न: पशुपालक अब क्या उम्मीद कर सकते हैं?
उत्तर: अगर सरकार अल्टीमेटम पर अमल करती है, तो 10 अक्टूबर तक दोनों जिलों में पशु शिविर और चारा डिपो शुरू हो सकते हैं। साथ ही पेयजल व्यवस्था में सुधार और चारागाह भूमि की समीक्षा की उम्मीद भी है।