सनातन परंपरा में श्राद्ध और पितृ पक्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व माना जाता है। यह समय हमारे पूर्वजों—जिन्हें आम भाषा में ‘पितर’ कहा जाता है—के प्रति आभार, श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का एक समर्पित काल है।
भारतीय सनातन संस्कृति में माता-पिता और पूर्वजों को ईश्वर के समान अतुलनीय और पूजनीय माना गया है। जीवित रहते हुए उनकी सेवा-शुश्रूषा करना हमारा परम कर्तव्य है, लेकिन उनके देवलोकगमन के पश्चात भी उनके प्रति अपनी कृतज्ञता और आदर प्रकट करने का मुख्य माध्यम ही ‘श्राद्ध’ कहलाता है।
प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तक के 16 दिनों की अवधि को ‘पितृ पक्ष’ या ‘श्राद्ध पक्ष’ के रूप में मनाया जाता है।
आइए विस्तार से जानते हैं कि श्राद्ध क्या है, इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई, इसे करने से मनुष्य को क्या-क्या पुण्य फल प्राप्त होते हैं, और राजस्थान में इसकी क्या खास सांस्कृतिक परंपराएं हैं।
श्राद्ध कब शुरू होगा और कब समाप्त होगा
प्रत्येक वर्ष पितृ पक्ष की तिथियां पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या के बीच तय होती हैं।
- पूर्णिमा श्राद्ध :- 26 सितंबर 2026 शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध से पितृ पक्ष का प्रारंभ होगा।
- प्रतिपदा श्राद्ध :- 27 सितंबर 2026 रविवार से कृष्ण पक्ष की तिथियों का श्राद्ध मुख्य रूप से शुरू होगा।
- सर्वपितृ अमावस्या :- 10 अक्टूबर 2026 शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।
श्राद्ध क्या होता है
श्राद्ध शब्द की उत्पत्ति श्रद्धा से हुई है अर्थात जो कार्य पूरे भक्ति भाव, सम्मान और श्रद्धा के साथ अपने पितरों के निमित्त किया जाए उसे “श्राद्ध” कहते हैं।
अगर हम शास्त्रों को देखें तो जब शरीर शांत हो जाता है तब भी उसकी आत्मा का अस्तित्व हमारे बीच बना रहता है। पितृ पक्ष के दौरान पितर देवलोक से पृथ्वी लोक पर अपने परिजनों के बीच आते हैं। इसी दौरान उनके नाम से तर्पण, पिंडदान, जल अर्पित करना और ब्राह्मण या जरूरतमंदों को भोजन कराना ही शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध माना जाता है।
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श्राद्ध की परंपरा कब से शुरू हुई
हिंदू पौराणिक कथाओं और धर्म ग्रंथों में श्राद्ध परंपरा का उल्लेख प्राचीन काल से ही मिलता है।
- महाभारत और कर्ण की कथा :- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध में दानवीर कर्ण की मृत्यु के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची तो उन्हें खाने के लिए सोना-चांदी और आभूषण दिए गए। कर्ण ने इंद्रदेव से पूछा कि उन्हें अन्न की जगह सोना क्यों दिया जा रहा है, तब इंद्र ने बताया कि आपने जीवन भर केवल सोना-चांदी ही दान किया, अपने पितरों के नाम से कभी जल या अन्न दान नहीं किया। कर्ण ने कहा कि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी नहीं थी। इसके बाद इंद्रदेव ने कर्ण को 16 दिन के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा जहां कर्ण ने अपने पितरों के निमित्त अन्न और जल का तर्पण किया। तभी से इन 16 दिनों को पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाने लगा।
- महर्षि निमि द्वारा शुरुआत :- ग्रंथों में यह भी माना जाता है कि सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि अत्रि ने अपने पुत्र निमि को दिया था। इसके बाद से ही मानव समाज में विधिवत तर्पण और पिंडदान की परंपरा स्थापित हुई।
राजस्थान में श्राद्ध की अनूठी परंपरा
राजस्थान अपनी समृद्ध संस्कृति, लोक आस्था और पारंपरिक मूल्यों के लिए जाना जाता है। राजस्थान में श्राद्ध पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और पशु-पक्षियों के प्रति दया का भाव दिखाने का एक बहुत बड़ा पर्व के रूप में मनाया जाता है।
- काग बास (कौवे को भोजन) :– राजस्थान में श्राद्ध के दिन घर की छत पर कौवे को भोजन कराने की विशेष परंपरा है। माना जाता है कि कौवा पितरों का संदेशवाहक होता है और उसके भोजन ग्रहण करने से पितर तृप्त होते हैं।
- गो ग्रास और श्वान बलि :- भोजन की पहली थाली गाय और कुत्ते के लिए निकाली जाती है।
- सांझी की परंपरा :- मालवा और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में पितृ पक्ष के दौरान कुंवारी कन्याएं घर की दीवारों पर गोबर और फूलों से सांझी माता की आकृतियां बनाती हैं और शाम को लोकगीत गाती हैं।
- पुष्कर क्षेत्र में तर्पण :- अजमेर का पवित्र पुष्कर सरोवर पितृ तर्पण के लिए भारत के प्रमुख तीर्थों में से एक माना जाता है। राजस्थान और आसपास के राज्यों से हजारों लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पुष्कर के घाटों पर पिंडदान करने तथा तर्पण करने के लिए आते हैं।
- पारंपरिक पकवान :- राजस्थान में श्राद्ध के दिन विशेष रूप से गुलाब जामुन, खीर, मालपुआ, नुक्ती और पूरी-सब्जी बनाई जाती है और ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराकर दक्षिणा भी दी जाती है।
श्राद्ध करने से क्या होता है
धर्म शास्त्रों और गरुड़ पुराण के अनुसार श्राद्ध करने से घर-परिवार में विशेष कृपा बनी रहती है और घर में विशेष शांति मिलती है।
- पितृ दोष से मुक्ति :- यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो पितृ पक्ष में नियमपूर्वक तर्पण करने से यह दोष शांत होता है और जीवन में रुकावटें दूर होती हैं।
- सुख-समृद्धि और वंश वृद्धि :- प्रसन्न पितर अपने वंशज को सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं।
- पारिवारिक क्लेश का नाश :- घर में नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और तालमेल बढ़ता है तथा घर में विशेष शांति प्राप्त होती है।
- आत्मिक संतोष :- अपने पूर्वजों के प्रति अपना कर्तव्य निभाने से मन को असीम शांति और आत्मिक संतोष मिलता है।”
पितृ पक्ष में क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- प्रतिदिन सुबह स्नान करके सूर्य देव को जल अर्पित करें और पितरों का ध्यान करें।
- कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों को भोजन-पानी अवश्य दें।
- किसी भी भूखे या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न और वस्त्र दान करें।
- श्राद्ध के दिन सात्विक भोजन बनाएं।
क्या न करें
- इन 16 दिनों में नए घर का गृह प्रवेश, शादी, सगाई या कोई अन्य मांगलिक कार्य न करें।
- इस दौरान मांस-मदिरा, तामसिक भोजन, प्याज और लहसुन के सेवन से परहेज करें।
- किसी भी बुजुर्ग, माता-पिता या असहाय व्यक्ति का अपमान न करें।
- नए कपड़े या कीमती वस्तुएं खरीदने से बचना चाहिए।
श्राद्ध पक्ष हमारी उस महान संस्कृति का हिस्सा है जो हमें सिखाती है कि रिश्ते केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं होते हैं। पूर्वज भले ही अपने शारीरिक रूप में हमारा साथ न दे रहे हों, लेकिन उनकी शिक्षाएं, उनके संस्कार और उनका आशीर्वाद सदैव हमारे साथ रहता है। इस पितृ पक्ष में आइए हम सभी अपने पितरों का स्मरण करें, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और अपनी सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों की मदद करके इस परंपरा को सार्थक बनाएं।